आगामी त्रिपुरा चुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने

साभार: विकिमीडिया कॉमन्स

आगामी 18 फरवरी को त्रिपुरा में अब तक का सबसे बड़ा चुनावी घमासान देखने को मिल सकता है। वामपंथियों के इस गढ़ में सत्ता हासिल करने के लिए पहली बार दक्षिणपंथी बीजेपी सीधे मुकाबले में नजर रही है।
इसके लिए भाजपा ने कमर कस ली है। ‘चलो पलटाई’ के नारे के साथ बीजेपी अपने धुर विरोधी सीपीएम के साथ चुनावी नारे से लेकर पार्टी के झंडे तक लड़ाई लड़ रही है। बीजेपी के कमल निशान वाले झंडे हर उस जगह पर देखे जा सकते हैं, जहां सीपीएम के झंडे लगे हैं। बीजेपी ने त्रिपुरा में भी पीएम मोदी की लोकप्रियता को भुनाते हुए सत्ता में आने के लिए पूरा जोर लगा दिया है।
बताया जा रहा है कि भाजपा ने वामपंथि मुक्त भारत का नारा दिया है और उसकी नजर आदिवासी वोटों पर है। त्रिपुरा में 30 फीसदी आदिवासी हैं और 60 में से 20 सीटें उनके लिए आरक्षित हैं। राज्य में कुल 19 आदिवासी जातियां हैं।
वहीँ, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा है। राहुल कैलाशहार में रैली करने पहुंचे थे। राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘मोदी जी आते हैं, 2-3 वायदे कर जाते हैं, चुनाव के बाद भूल जाते हैं। जहां भी जाते हैं, कुछ ना कुछ गलत वायदे करके चले जाते हैं।’
दूसरी तरफ विशेषज्ञों का समीकरण कुछ और कहता है. पिछला विधानसभा चुनाव लड़ने वाले 249 उम्मीदवारों में से 14 ने इस बार अपनी निष्ठाएं बदल ली हैं। इन 14 में से अब 11 भाजपा के खेमे में हैं। ये सभी भाजपा के ही टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। भाजपा में शामिल होने वाले तमाम विधायक पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे। हालांकि इनमें से छह पहले कांग्रेस छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में चले गए थे। इसके बाद वे भाजपा में शामिल हो गए थे। 
बता दें कि भाजपा राज्य की 60 में से 51 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाकी नौ सीटें उसने अपनी सहयोगी इंडीजीनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के लिए छोड़ी है।