आई आई टी जैसी संस्थानों में भी दलित के साथ भेदभाव

मार्च 2012 में सुनीता और संजय अंभोर को आई आई टी मुंबई से एक पत्र मिला, जिसमें उनके बेटे अनिकेत के अपने कॉलेज के दो पाठ्यक्रमां में फेल होने के बारे में बताया गया था। अनिकेत को कॉलेज में अनुसूचित जाति आरक्षण के तहत दाखिला मिला था। अनिकेत के माता-पिता को ये बताया गया कि उनका बेटा पढाई के बोझ को नहीं संभाल पा रहा है। और वहीं अनिकेत ने जातिगत भेदभाव के चलते अपने छात्रावास की छठी मंजिल से गिरकर अपनी जान दे दी।
2007 में शिक्षाविद् कुरमना सिंह चालम अपनी किताब ‘चैलेंज ऑफ हाईयर एजुकेशन’ में कहते हैं, “कुछ उच्च जाति के प्रोफेसर दलित छात्रों को शिक्षा के काबिल नहीं समझते हैं।”
2011 में ‘डेथ ऑफ मेरिट’ डॉक्यूमेंट्री के फिल्मकार अनूप कुमार कहते हैं कि 2007 से 2011 के बीच आई आई टी में 80 प्रतिशत दलित छात्रों ने आत्महत्या की है। 2008 में सरकार ने आई आई टी के सहायक प्रोफेसर और विज्ञान और प्रौद्योगिकी लेक्चरर पद में 15 प्रतिशत, 7.5 फीसदी और 27 फीसदी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति को नियुक्त करने का आदेश दिया है। पर एक दशक बाद भी ऐसा अमल में नहीं लाया गया।
आई आई टी प्रोफेसरों के पदों में से 1.12 प्रतिशत ही दलित प्रोफेसर नियुक्त हैं आई आई टी में 0.12 प्रतिशत आदिवासी, अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 1.84 प्रतिशत फैकल्टी थी। सूचना के अधिकार के प्राप्त सूचना के अनुसार आई आई टी मद्रास में 2.42 प्रतिशत शिक्षक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के थे, साथ ही मुंबई में ये आंकड़ा 0.34 प्रतिशत था। इन आंकड़ों से साफ पता चलता हैं कि देश में आज भी दलितों के साथ भेदभाव होता है।

फोटो और लेख साभार: इंडियास्पेंड