आइए मिलते हैं झाँसी की कवयित्री अर्चना सेवन्या से

जिला झांसी, मुहल्ला शिवाजी नगर कत हे के कला कोऊ की मोहताज नइ होत और जब मन में लगन होबे तो बात ही अलग हे। एसो ही कछू कर के दिखाओ झांसी जिला की अर्चना सेवन्या ने। अर्चना पापा के डर से छुप छुप के शायरी और कविता लिखत ती आज उनकी किताबे भी छपन लगी। बच्चा, बूढ़े, आदमी, ओरत हर कोऊ पे कविता लिखी जो आगे बढ़ बे की सीख देती।
अर्चना को कबो हे के हमाय पति कबहु कविताएं नइ सुनत ते लेकिन हमाई ख़ुशी को ठिकानो तब नइ हतो जब हमाय पति ने हमाई कविता की किताब छपबा के हमे अचानक ख़ुशी दइ।
अर्चना ने बताई जब हम पंद्रह सोलह साल के हते जब से हमने शायरी और कविता लिखबो शुरू करो तो। पहले दो तीन लाइन की कविता लिखत ते। चाहे कैसी भी लिखे लेकिन डर लगत तो के पापा न देख ले काय के पापा बोहतई गुस्सा होत ते। कत ते के पढ़ाई नइ करने का। तो उतई रुक जात ते। लेकिन हमाय छोटे बहिन भज्जा बे कत के दीदी आप बोहतई अच्छो लिखती तुम लिखबो बंद नइ करियो।
पहले छोटी मोटी शायरी लिखत ते फिर जब मतलब समझ में आओ कबे कविता बन गयी और शायरी बढ़ी होत चली गयी और उन ने कविता को रूप ले लओ।
हमाई पहली कविता हती ओरतन को करो सम्मान। अगर मूड अच्छो हे और लिखबे को मन कर रओ तो कोनऊ एक शव्द मिल जाए जो लिखबे और बोलबे में अच्छो लगे बोई भोत होत।
बेटी बचाव बेटी पढ़ाओ कहते तो सभी हे, पर उने बचात हर कोऊ नही हे, हर एक उन्हें दुनिया में लाता नही हे, क्यों उन्हें पढने का रेस बनता नही हे, बेटियों को हर कोई पढ़ता नही हे।

रिपोर्टर- सोनी

05/06/2017 को प्रकाशित