अलविदा रिया 

पत्रकारिता महिलाओं का पेशा नहीं है, सब मुझसे यह कहते। तुम तो ब्यूटी पार्लर चलाओ! शायद सभी महिला पत्रकारों ने यह हिदायत ज़रूर सुनी होगी। रिया उन महिला पत्रकारों में थी जिसने यह हिदायत सुनने के बाद भी पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया।  बुंदेलखंड के बाँदा शहर में रिया अकेले ही पत्रकारिता की डगर पर चल पड़ी। इसके लिए हम उसको दाद देते हैं। कोई संस्था या साथी नहीं, अकेली ही रिया रिपोर्टिंग करती रही। खबर लहरिया की पत्रकार अक्सर रिया को सरकारी दफ्तरों में या किसी सार्वजनिक जगह पर रिपोर्टिंग करते हुए मिल जातीं। एक महिला पत्रकार होने के नाते रिया की कहानी खबर लहरिया की कई महिला पत्रकारों से मिलती -जुलती सी है। बार -बार अधिकारियों के पास जानकारी लेने के लिए चक्कर लगाना, मीडिया के कई मंचों से बाहर रहना क्योंकि वहां सिर्फ पुरुषों का जमघट रहता है। बाक़ी मीडिया का यह सोचना कि यह सिर्फ महिलाओं के मुद्दों पर ही रिपोर्टिंग कर सकती है।  इन सबके बावजूद अकेली ही रिया बाँदा में रिपोर्टिंग करती रही।  और आखिर में अकेली ही रिया गुज़र गई।  रिया के दिल के तीन वाल्व की सर्जरी हुई। बीमारी के दौरान चंद गिने -चुने लोगों ने उसकी मदद की, बाँदा के अन्य मीडिया या प्रशासन से कोई मदद करने आगे नहीं आया।  रिया का ऑपरेशन तो हुआ लेकिन उसके बाद रिया को इन्फेक्शन हो गया। आखिर में 25 फरवरी को रिया का देहांत हो गया।
अफ़सोस कि रिया का सफर अधूरा रह गया। अफ़सोस हम बाँदा में अब कभी नहीं मिलेंगे।  अफ़सोस कि हमारे इलाके में गिनी चुनी महिला रिपोर्टर्स में से एक कम हो गई।  अफ़सोस कि हमारा साथ ख़त्म हो गया।
अलविदा रिया, उम्मीद है तुम्हारे हौसले से बाँदा में और लड़कियों को हिम्मत मिलेगी।
रिया के साथ हमारा 2017 का इंटरव्यू देखने के लिए, यहां क्लिक करें
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Farewell, Riya

‘Journalism isn’t really a field for women, everyone would tell me. You should run a beauty parlour!’ Every woman journalist must have been given this advice at some point of their lives. Riya was among those who chose journalism as her profession, despite the unsolicited advice; making Banda in Bundelkhand her battle ground of sorts. For this, we laud her. Unattached to an organization, minus the support of her colleagues, Riya would work alone. As Khabar Lahariya journalists, her path often crossed ours; and as women journalists working in rural Bundelkhand, our life stories resonated as well. Being driven around for an official byte endlessly, not being invited onto media platforms because that was the domain of men. Also, the general perception men have of women journalists is that they only cover women’s issues.
Despite all the dissonance, Riya worked as a reporter, alone.
And Riya died alone too.
Riya underwent a heart surgery recently. During the medical process, there were very few who rallied around Riya, who helped her. Neither the media nor the officials expressed even an interest in supporting her. Suffering from post-op complications and a septicaemia setting in, Riya passed away on February 25.
It is unfortunate that her journey was cut short. We are deeply saddened knowing our paths will never cross again, that the women reporters’ count has gone down by one – already a miniscule proportion where we work. We are tearful at losing a friend. And yet hopeful that Riya’s brave journey inspires many a young woman.
Watch our 2017 interview with Riya here.

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