“अभी भी खेलना सीख रही हूँ” : भारत की टॉप गेंदबाज झूलन गोस्वामी

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भारत में किसी भी युवा महिला क्रिकेटर, खास कर गेंदबाज से यदि यह सवाल करें कि उनकी आदर्श महिला क्रिकेटर कौन है तो निश्चित रूप से झूलन गोस्वामी का नाम सबसे पहले लिया जाएगा।

गोस्वामी अपने समय की एक महान महिला क्रिकेटर है। वह सम्मान के साथ 12 सालों से क्रिकेट खेलती आ रही  हैं। एक दिवसीय क्रिकेट मैच में वह दूसरी ऐसी महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंने सबसे ज्यादा विकेट लिए हैं। भारतीय टीम की कप्तानी करते हुए वह डाएना एडुलजी के बाद दूसरी ऐसी महिला क्रिकेटर हैं जिनको पद्मश्री से सम्मान्नित किया गया है।

गोस्वामी के इस लम्बे क्रिकेट कैरियर में काफी उतार चढ़ाव आये। लेकिन अभी भी वह अपने साथ जुड़े नए खिलाड़ियों से सीखती हैं और उनके अनुभव सुनने में रूचि रखती हैं।

वह कहती हैं, “जब मैं बड़ी हुई तब मेरे पास कोई नहीं था जो मुझे कुछ बताता, कहता, सुनता या किसी कार्य के लिए मनोबल बढ़ाता। यह सब मुझे खुद ही करना पड़ा और यही मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।”

“आज की लड़कियां व्यवस्थाओं की कमीयों को पार कर के आगे बढ़ रही हैं। इसको देख कर मुझे ख़ुशी होती है। इस खेल को खेलने के लिए उत्साह का होना जरुरी है। आज की पीढ़ी जागरूक है और जानती है कि सफलता के लिए क्या जरुरी है। इसलिए मैं कभी भी उनसे सीखने का मौका नहीं गंवाती। मैं मानती हूँ कि एक टीम की सबसे विशेष बात यही है कि सब एक दूसरे से सीखते हैं।”

गोस्वामी बताती हैं कि “यदि आज किसी महिला क्रिकेटर से यह सवाल किया जाए कि उनका क्रिकेट में आना कैसे हुआ तो ज़ाहिर है कि वो कहें कि ‘एक घटना के कारण’ ऐसा हुआ। लेकिन मेरी कहानी ऐसी नहीं थी। बचपन से मुझे पढ़ाई करने पर अधिक जोर देने को कहा जाता था लेकिन मैं विद्रोही स्वभाव की थी और अपने मन का करती थी।” (वो जोर से हंसती हैं) वह आगे कहती हैं, ‘‘जब से मैंने कपिल देव और इमरान खान को 1992 के वर्ल्ड कप में खेलते देखा तभी से मैंने अपनी सारी ताकत क्रिकेट खेलने में लगा दी।”

गोस्वामी ने जब महिला वर्ल्ड कप 1997 का फाइनल देखा तब से उन्हें क्रिकेट की तरफ अपना अधिक झुकाव नजर आने लगा। इस बारे में वह कहती हैं कि ‘वो पहला महिलाओं का मैच था जिसे मैंने देखा और तभी से मैंने उनके बीच मैदान में खेलने का मन बना लिया। मेरे माता-पिता और भाई मेरी इस इच्छा को सुन कर मेरे लिए अधिक चिंतित हो गये। मुझे यह समझ में आ गया था कि अगर मुझे क्रिकेट खेलना है तो मुझे मेरी आरामदायक ज़िन्दगी से बाहर आना होगा। इसके लिए परिवार को मनाना मेरी पहली जंग थी। उन्हें लगता था कि यह एक महंगा खेल है।

लेकिन गोस्वामी की चुनौती यहीं खत्म नहीं हुईं। उनका शहर चकदहा कलकत्ता से 3 घंटे की दूरी पर था। जबकि वह सबसे नजदीक क्रिकेट सेंटर(वेस्ट बंगाल) माना जाता था। लेकिन उन्हें कुछ बड़ा करना था इसलिए 3 घंटे आने, 3 घंटे जाने और 4 घंटों की प्रैक्टिस, ये सब बहुत कठिन होते हुए भी उन्होंने ख़ुशी से किया। वह कहती हैं, “मेरे कोच स्वपन साधु कठोर अनुशासक थे और मैं इस बात का ख्याल रखती कि समय से आऊं वरना मेरा समय बर्बाद हो जाता। आज जब मैं अपने संघर्ष को सोचती हूँ तो सब कुछ बहुत कठिन होते हुए भी सब सही लगता है।”

jhulanteam2001 में राष्ट्रीय टीम में चुने जाने के वह बहुत करीब थी। लेकिन उनका चुनाव नहीं हुआ। फिर एक साल बाद जब इंडिया इंग्लैंड के खिलाफ खेलने वाली थी तब उन्हें बुलाया गया। वह कहती हैं, “पूर्णिमा राऊ, अंजुम चोप्रा, अंजू जैन जैसी बड़ी खिलाडियों के साथ खेलना मेरे लिए अकल्पनीय अनुभव रहा।

उस समय, इंडियन टीम की वर्तमान कप्तान मिथली राज और मैं टीम में बच्चे जैसे थे। अब सोच कर अजीब लगता है क्योंकि अब हम टीम के सीनियर खिलाड़ी हैं। अभी भी ऐसा लगता है जैसे कल ही की बात हो कि हमने साउथ अफ्रीका और इंग्लैंड को उनके मैदान में जा कर हराया।”

उनके खेल के ख़ास पलों के बारे में पूछने पर उन्होंने पहले तो बहुत लम्बे समय तक सोचा और फिर कहा, “हमने बहुत कम टेस्ट मैच खेले हैं पर 2014 का इंग्लैंड मैच मेरे लिए खास था।” अखबारों में हमारे बारें में कभी कोई खबर नहीं आती थी लेकिन इस मैच के बाद, हमें अख़बारों में भी जगह मिल गयी।

बी.सी.सी.आई (भारत में क्रिकेट पर नियंत्रण रखने वाला संस्थान) के नियंत्रण में आने के बाद मैच कम हो गये लेकिन खेल में सकारात्मक बदलाव आया। अब खेल के लिए हमें सुविधाएं मिलने लगीं, हमें खर्चे मिलने लगे और बहुत कुछ बेहतर बदलाव आया।

मेरा अंतिम लक्ष्य सिर्फ विश्व कप जीतना था। 2009 में सेमीफाइनल के बाद हम जीत के बेहद करीब थे लेकिन विश्व कप नहीं जीत सकें। 2016 में मैं इस जीत की, एक बार फिर उम्मीद कर रही हूँ।”

लेख/फोटो साभार: विस्डेन इंडिया