अपने हक़ के लिए कब तक भूखा लडेगा, और मरेगा किसान?

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17 मार्च, दिल्ली मे भारतीय किसान यूनियन की महापंचायत का आयोजन जंतर-मंतर में हुआ। अपनी आधारभूत आवश्यकताओं और अपने हक़ के लिए देश भर से आये किसानों ने भारतीय किसान यूनियन ने द्वारा आयोजित इस महापंचायत रूपी धरने में बढ़-चढ़ के हिस्सा लिया। इस महापंचायत में महाराष्ट्र के शेतकरी संगठना, कर्नाटक राज्य रेत संघ आदि कई अन्य संगठन शामिल हुए।

प्रधानमंत्री को संबोधन कर, किसान महापंचायत ने अंत में किसानों का एक ज्ञापन केंद्रीय कृषि मंत्री को भेजा।

किसानों की कुछ मांगे यह थी-

1) फसलों के लिए उचित और लाभकारी मूल्य की मांग: किसानों की मांग थी कि भाजपा के घोषणापत्र में लिखित घोषणाओं को लागू किया जाए जिसमें कहा गया है कि किसानों को खेती की लागत के ऊपर 50% मूल्य रकम मिलेगी।

2) स्थाई और गारंटी के साथ आय प्राप्त हो: किसानों के लिए आय आयोग की स्थापना की जानी चाहिए।

3) कृषि ऋण को समाप्त कर दिया जाए: किसानों में बढ़ती आत्महत्याओं के पीछे मुख्य कारण है उनका ऋणी होना अथवा कर्ज के बोझ के तले दबना। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है की 2016-17 के आम बजट में 5,51,000 करोड़ रूपए की कॉर्पोरेट इनकम टैक्स, उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बड़े व्यापारियों के लिए समाप्त कर दिया गया जबकि इसी समय देश के किसान अपने भारी कर्जों को चुकाने के चक्कर में अपनी जान दे रहे हैं। देश में बढ़ते कृषि संकट को देखते हुए, किसानों के सभी ऋण और कर्जे माफ़ कर दिए जाएं।

4) प्राकृतिक आपदाओं के लिए केंद्रीय नीति बनायीं जाए: प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले नुकसान के लिए सरकार द्वारा राहत और मुआवजे के लिए उपाय किए जाएं। फसल नुकसान का सही आंकलन हो और जिन आपदाओं को राजनीतिक कारणों की वजह से घोषित नहीं किया जा रहा है उन्हें जल्द ही राहत कोष के साथ किसानों को उपलब्ध कराया जाए। किसानों को खाद्य फसलों के लिए 30,000 रुपये प्रति हेक्टेयर और वर्षा और ओलावृष्टि के कारण मार्च में हुई फसल के नुकसान की भरपाई, 50,000 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से तत्काल की जाए।

5) फसल बीमा योजना: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत केवल ऊपरी बदलाव किए गये हैं जबकि यहां किसानों को तत्काल ठोस उपाय चाहिए। इस बारे में सरकार को किसानों के लिए फसल बीमा योजना जल्द-से-जल्द शुरू करनी चाहिए जिसमें नुकसान का आंकलन, बीमा संबंधी कागजात, कितनी फसल का उगाई गई और कितनी नुकसान हुई इस हिसाब से भरपाई की जाए और हर फसल को इस योजना में शामिल किया जाए।

6) जीएम फसलों पर प्रतिबंध लगाना: जैनेटिकली मोडिफाइड क्रॉप यानि जीएम फसलों की खेती पर प्रतिबंध लगाना।

7) गन्ना किसानों को बकाया भुगतान: पिछले दो साल में, देश भर के गन्ना किसानों के लिए मूल्यों में कोई भी वृद्धि नहीं की गई। इस मांग में किसान, गन्ना किसानों के लिए उनके बकाए का तुरंत भुगतान चाहते हैं साथ ही मूल्यों में वृद्धि का प्रस्ताव भी रखते हैं।

8) किसानों के हित किए लिए डब्लूटीओ के साथ समझौता न करे: दिसम्बर 2015, नैरोबी में आयोजित डब्लूटीओ मंत्रालीय बैठक में किसानों के हितों को ध्यान में न रखते हुए, आयातों पर नजर रखी जिसके बाद से किसानों में आत्महत्याओं के मामले बढ़ गये। डब्लूटीओ का इस बारे में हस्तक्षेप होना विकासशील देश, जैसे-भारत के लिए उचित नहीं है और इसका किसान विरोध करते हैं।

9) फ्री ट्रेड अग्रीमेंट यानि खुले व्यापार समझौते को खत्म करना: भारतीय किसान वैसे ही मौसम और बाज़ार की मार सहते हैं और उसके ऊपर खुले व्यापार समझौते के आने के बाद कैनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड जैसे देशों को अपने बाज़ार में हिस्सा देना, किसानों के लिए नुकसान का बड़ा कारण बनेगा। किसान इस समझौते की समाप्ति चाहते हैं।

भारतीय किसान यूनियन जींद रामफल कंडेला ने कहा कि किसानों को फसल बीमा योजना से कोई लाभ नहीं हो रहे।  सरकार द्वारा किए गए सभी बड़े-बड़े दावों के बावजूद, स्थिति ऐसी है कि बैंक अधिकारियों द्वारा खुद ही किसानों का बीमा प्रीमियम घटा दिया जाता है और इस बारे में बीमा योजना कंपनियों को बताया भी नहीं जाता।

इस बारे में, पंजाब के फाजिल्का जिले से आये, माखन सिंह ने कहा कि राहत स्वरूप प्रदान की गई राशि बहुत कम होती है। यह राशि देने से पहले कभी जमीन का किराया और उचित भुगतान राशि का अनुमान नहीं लगाया जाता।

उत्तरप्रदेश से महिला किसानों की एक समूह ने शिकायत की है कि वे सूखे, बेमौसम बारिश और ओलों के कारण लगातार फसल को नष्ट होता देख रही हैं। बीकेयू के राकेश टिकैत और महासचिव युद्धवीर सिंह के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा कि किसानों की मुख्य चिंताएं उनकी फसलों के लिए उचित और लाभकारी मूल्य का मिलना है।

लेख/फोटो साभार: डाउन टू अर्थ