अपने प्रति सामाजिक सोच को बदलती विधवा महिलाएं

फोटो साभार: विकिमीडिया

चार साल से पांच सौ विधवा महिलाएं स्वयं सहायत समूह की मदद से अड़सठ गांवों में बदलाव ला रही हैं। गुजरात के सोमनाथ जिले के गिर ब्लाक के कोडिनार गांव में ‘सोरठ महिला विकास मंडली’ स्वयं सहायता समूह 1999 से चला रहा है। लेकिन ये कोई आम सहायता समूह नहीं हैं, बल्कि ये विधवा महिलाओं के द्वारा शुरु किया गया है।
ये समूह बचत की आदत को बढ़ावा देने के साथ जरुरतमंद महिलाओं को ऋण देने का काम करता है। हमारे समाज में विधवा महिलाओं को लेकर एक सोच है कि पति की मौत के बाद वे एक खास तरह के कपड़े और श्रृंगार से दूर रहने के साथ शुभ कामों में शामिल नहीं रहेंगी। इन मान्यताओं को तोड़ने के लिए इन महिलाओं ने काम करने की सोची और ये समूह बन गया। इस समूह में सभी जातियों की महिलाएं सामाजिक एकता और महिला समानता के लिए काम कर रही हैं।
समूह की सदस्य जया बेन कहती हैं, कि लोग हमें खुश होकर ये अधिकार नहीं देंगे, इसलिए हमें एक इंसान होने के नाते अपने अधिकार खुद से ले लेने चाहिए। इस समूह ने 2011 में विधवा महिलाओं को पहचान दिलाने के लिए एक सामजिक पहल की शुरुआत की। इसके माध्यम से गांवां में जागृकता फैलाने का काम किया गया। विधवा महिलाओं के परिवार के सदस्यों को उसके जीवन को सामान्य करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। समूह ने बदलाव के लिए रैली, सामुदायिक बैठक, जागृकता कैम्प और घर-घर का दौरा किया। इसका ही नतीजा है कि आज मंडली की मदद से पांच सौ विधवा महिलाएं आम जीवन जी रही हैं।
ये सभी महिलाएं ऐसे क्षेत्र से आती हैं, जहां कमाई के स्त्रोत कम हैं और इस स्थिति में परिवार चलना बहुत मुश्किल हो जाता है। सभी सहायता समूह के सदस्य ‘सोरठ महिला विकास मंडली’ में एक हजार सालना बचत जमा करती है। जरुरत के समय इस बचत से उधार लेती हैं। समूह के प्रयासों का नतीजा है कि आज जमा राशि एक लाख हो चुकी है। आज ‘सोरठ महिला विकास मंडली’ महिलाओं की आवाज बन गई है, जो सामाजिक भेदभाव के खिलाफ है।