अनिवार्य मातृत्व योजना पर मोदी की बात नयी नहीं है

साभार: रॉयटर्स

वर्ष 2017 की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए नोटबंदी और अर्थव्यवस्था के अलावा, मातृत्व योजना पर बात करी। पर क्या उसमें कुछ नया था? नहीं! जिस योजना को लागू करने की मोदी ने बात की वो कांग्रेस की मुख्य योजनाओं में से एक थी।
वर्ष 2013 में पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में सार्वभौमिक मातृत्व हक को कानूनी अधिकार बना कर लागू किया गया था और उस समय इस योजना की विपक्ष यानी भाजपा द्वारा खासा विरोध भी किया गया था। लेकिन अब इसी योजना को नए नाम के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों के सामने पेश किया है। इसमें प्रति बच्चे पर महिलाओं को छह हजार रुपये देने का प्रावधान किया गया है। यही नहीं, इससे नियोजित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को सवैतनिक चार से छह महीने छुट्टी का अधिकार मिला। हालाँकि इससे बहुत कम महिलाओं को लाभ मिलेगा, क्योंकि 90 फीसदी कार्यबल अनियोजित क्षेत्र में काम करता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मातृत्व हक को अनियोजित क्षेत्र में भी बराबरी से लागू किया जा सकता है। हर प्रसूता को सार्वभौमिक मातृत्व हक के तहत छह हजार रुपये देने पर करीब 16 हजार करोड़ रुपये खर्च आएगा, जो जीडीपी का 0.2 फीसदी है।
एक अध्ययन बताता है कि भारत में नवजातों की मृत्युदर काफी ज्यादा है। वर्ष 2013 में जहां भारत में प्रति हजार बच्चों पर नवजात मृत्युदर 29 थी, वहीं चीन में यह आंकड़ा मात्र 7.7 था। नवजात बच्चों की उच्च मृत्युदर का एक बड़ा कारण कम वजन के बच्चों का पैदा होना है। पहले से ही कम वजन की भारतीय महिलाएं गर्भावस्था के दौरान बहुत कम वजन हासिल कर पाती हैं। नकद हस्तांतरण के रूप में मातृत्व हक देने से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि महिलाएं बेहतर भोजन करेंगी और गर्भावस्था के दौरान उनका वजन बढ़ेगा। जाहिर है, कुछ अन्य मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें उचित स्वास्थ्य सुविधाएं, पोषक आहार, गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त आराम आदि।
इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना 53 जिलों में लागू है। जिसके बारे में मोदी का कहना है कि यह महिलाओं के लिए कारगर नहीं रही और न ही इसका कार्यक्रम सफल रहा। इस योजना की कमी को पूरा करने के लिए भी उन्हें प्रभावित योजनाओं को नए सिरे से शुरू करने की आवश्यकता महसूस हुई।
इस बीच दो राज्य सरकारों-तमिलनाडु और ओडिशा ने सार्वभौमिक मातृत्व हक लागू किया। तमिलनाडु में वर्ष 1987 से मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी मातृत्व लाभ योजना लागू की गई थी, जिसके तहत अब प्रति बच्चे पर 12,000 रुपये दिए जाते हैं और इसे बढ़ाकर 18,000 रुपये किए जाने की संभावना है। ओडिशा की ममता योजना के तहत वर्ष 2011 से प्रति बच्चे पर पांच हजार रुपये दिए जाते हैं। दोनों योजनाओं में मामूली शर्तें हैं, जैसे गर्भावस्था का पंजीकरण, प्रसव पूर्व जांच आदि।

साभार: द वायर