अघोषित हत्यारा ” बढती गर्मी और लू ”

0अपने 140 सालों के इतिहास में पहली बार भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अप्रैल से जून में चलने वाली गर्मी की लहर के लिए सुझाव दिए हैं। इन सुझावों में गर्मी से सम्बंधित चेतावनियां भी शामिल है। वैसी ही जैसी भारी बारिश और चक्रवातों के सम्बन्ध में दी जाती हैं। ये पूर्वानुमान एक बार में 15 दिन के लिए दिए जाने हैं। इनमे देश के लगभग 100 शहरों के तापमान से सम्बंधित पूर्वानुमान शामिल हैं। इन्हे देख कर लगता है कि सरकार और अनुसंधानकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन से होने वाले मानसून में आ रहे बदलावों पर ध्यान केंद्रित किया है। फिर भी गर्मी की लहर से निपटने के उपाए न के बराबर ही किए गए हैं।

प्राकृतिक आपदा प्रबंधन क़ानून 2005 और आपदा प्रबंधन पर राष्टीय योजना 2009 गर्मी की लहर को राष्ट्रीय आपदा नहीं समझते। इसलिए सरकार इस समस्या के उपाय पर भी ध्यान नहीं देती।  न तो वो इसपर खर्च करती है न ही इससे बचाव के लिए ज़्यादा काम करती है।

गर्मी की लहर बिजली गिरने और भूकम्प के बाद लोगों के मरने की तीसरी सबसे बड़ी वजह है। इसके बावजूद भी इसे प्राकृतिक आपदा नहीं मानती। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार गर्मी की लहर ने 2000 से 2014 के बीच 16,000 जानें ली हैं। 2015 में ही इसकी वजह से 2,241 जानें गईं। अनुमान है कि इस साल भारत में ज़बरदस्त गर्मी पड़ने वाली है।

शोधकर्ताओं के द्वारा बार-बार ये कहने पर कि गर्मी की लहर इस बार और भी खतरनाक होने वाली है, केंद्रीय, राजकीय और स्थानीय स्तर  पर सरकार ने इस समस्या की ओर ध्यान देना शुरू किया है।

 

PRAKRITIKHATYAREराज्यों ने की अगुआई 

लू से निपटने के लिए कोशिशें मुख्य रूप से राज्य सरकारों द्वारा ही की गई हैं। उदाहरण के लिए 1998 में उड़ीसा में चली भीषण लू ने 2 हज़ार जाने लीं थीं, जिससे बचाव के लिए राज्य सरकार ने ज़िला स्तरीय आपदा प्रबंधन केंद्र शुरू कर दिए थे। इसी तरह 2010 में अहमदाबाद में आई गर्मी की लहर ने 1344 जानें लीं थीं।  इसके बाद वहां 2013 में सिटी हीट एक्शन प्लान शुरू किया गया। जिससे सार्वजनिक जागरूकता बढ़ सके। इस साल मार्च में नागपुर और भुवनेश्वर ने भी शहर स्तरीय योजनाएं शुरू कर दी हैं।

प्रमाणित करना भी एक मुश्किल कड़ी है

मृत्यु और गर्मी की लहर का  आपस में सम्बन्ध बनना मुश्किल होता है।  इसकी वजह से राहत  कार्यों की योजना बनाना और उन्हें लागू करना कठिन हो जाता है।  उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश की सरकार ने पिछले साल गर्मी की लहर से मरने वालों के परिवारों को 1 लाख रुपए देने की घोषणा की।  मगर उन परिवारों में से ज़्यादातर को मुआवज़ा ये कहते हुए नहीं दिया गया कि मरने की वजह गर्मी की लहर है ये सिद्ध नहीं हो पाया।

“डॉक्टर मरने की वजह दिखाई दे रहे लक्षणों के आधार पर बताते हैं। ऐसे में वे अक्सर मृत्यु में गर्मी की भूमिका जानने में असफल हो जाते हैं। उदहारण के लिए कमज़ोर दिल वाले  व्यक्ति को दिल के दौरे से मरा माना  जाता है।  चाहे उसे दिल का दौरा गर्मी के कारण ही क्यों न पड़ा हो” इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के निदेशक दिलीप मावलंकर ने बताया। दोनों के बीच कड़ी बिठाने का सबसे अच्छा तरीका है कि व्यक्ति के मरने के फ़ौरन बाद उसका तापमान लिया जाए।” वे आगे बोले।

मौत के कारण का सम्बन्ध गर्मी की लहर से बैठाने में मुश्किलें आती हैं।  इन मुश्किलों की वजह से देश में इसकी वजह से होने वाली मौतों का सही अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है। अक्सर जितनी मौतें हुई होती हैं उनके मुकाबले अंदाज़ा काफी कम होता है। ये एक कारण हो सकता है कि गर्मी की लहर से मरने वालों से सम्बंधित नीचे दिए गए भारत और यूरोप के आंकड़ों में इतना फ़र्क़ है। जबकि दोनों की तेज़ी और समय बराबर था। इनके अनुसार यूरोप में 2003 में चली गर्मी की लहर से 70,000 लोग मरे जबकि 2015 में भारतीय गर्मी की लहर में केवल 2,241 लोगों के मरने का ही आंकड़ा दिया गया।

सरकारी आंकड़ों में लू या गर्मी से हुई थकान से होने वाली मौतों को ही गर्मी की लहर के कारण  होने वाली मौतें माना  जाता है। जबकि गर्मी कई तरह से मौत का कारण बन सकती है। “लू लगने के पीछे दो तरह के कारण हो सकते हैं।  एक तो ऐसा अत्यधिक गर्मी में शारीरिक थकान होने से हो सकता है। ऐसे में तुरंत असर दिखता है। दूसरा, आतंरिक अंगों पर ज़्यादा देर गर्मी में रहने के कारण पड़े तनाव की वजह से मौत हो सकती है।  इस हालत में लू लगने और मौत के बीच ज़्यादा समय होता है जिसके कारण दोनों का सम्बन्ध बिठाना मुश्किल हो जाता है।” मावलंकर ने बताया।

विशेषज्ञ बताते हैं कि लू लगने का शिकार वही लोग ज़्यादा होते है जिन्हे सरकार के प्रयासों से सहायता मिलने का मौका सबसे कम होता है। “हमने पाया है की झोपड़ पट्टी में रहने वालों और सड़कों पर मज़दूरी करने वालों को लू लगने का सबसे ज़्यादा खतरा होता है। जबकि उन तक दी जा रही सहायताएं बहुत कम पहुंचती हैं।  जब तक राहत कार्य उनको ध्यान में रखकर नहीं किए जाते, हम लू से होने वाली मौतों को नहीं रोक सकते।” इन्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर विमल मिश्र ने कहा।