अगर आप ‘मुसल्मान’ हो तो ‘शक के दायरे’ में हो!

ea60c989-c281-43c6-9cb8-88fed876e976 copy NEWजिला लखनऊ| आतंकवाद के आरोप में पकड़े जाने के आठ साल, सात महीने बाद पांच मुसलमान आदमी जनवरी 2016 को जेल से छूटे। इन पांच आदमियों – मुख्तार हुसैन, अली अकबर, अज़ीज़-उर-रहमान, नूर इस्लाम और नौशाद हफीज़ – को उत्तर प्रदेश की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने एक्सपलोसिव एक्ट के अंतर्गत 2007 में पकड़ा था। बताया गया कि ये इस्लामिक रूढि़वादी संस्था हरकतल-जिहाद-अल-इस्लामी (हूजी) के सदस्य है। कथित रूप से इनके पास से विस्फोटक भी बरामद किए गए।

अब इनके खिलाफ केस रद्द हो गया है। लखनऊ के स्पेशल कोर्ट ने इनके खिलाफ सारे इलज़ाम खारिज कर दिए हैं। ये पहली बार नहीं है कि यूपी में ‘आतंकवाद से सम्बंधित’ केस रद्द हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस अखबार के अनुसार पिछले दो साल में 17 बेगुनाह आदमियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। इस साल सुरक्षा संस्थाएं बेगुनाह लोगों को, जो अक्सर मुसलमान होते हैं, आईएसआईएस का होने के इलज़ाम में पकड़ रही हैं।
ध्यान दीजिएः मुख्तार हुसैन दर्जी था, अज़ीज़-उर-रहमान किसान और अली अकबर मौलवी बनने की तैयारी कर रहा था। उन्हें गलत इलज़ामों में आठ सालों के लिए जेल में डाल दिया गया। खबर लहरिया ने उनमें से कुछ से बात की कि किस तरह उनकी जि़ंदगी कुछ पलों में बदल गई।

अज़ीज़-उर-रहमान
उम्र – 31 साल
24 परागनास, पश्चिम बंगाल
मैं पश्चिम बंगाल से हूं और खेतों में काम करता हूं। मेरे दो बच्चे हैं। मैं चाहता था कि मेरे भी बच्चे खूब पढ़़ें और अच्छी जि़ंदगी जिएं। मगर 11 जून 2007 को मुझे पश्चिम बंगाल से चोरी के इलज़ाम में पकड़ लिया गया। आज तक मुझे नहीं पता कि मुझपर इलज़ाम क्या था ? मैंने चुराया क्या था?
16 जून को मुझे कोलकाता उच्च न्यायालय के सामने पेश किया। 22 जून को लखनऊ उच्च न्यायालय के सामने लाया गया। एसटीएफ ने इलज़ाम लगाया कि मैं 22 जून को अपने दोस्तों के साथ लखनऊ में था और कुछ गतिविधि करने वाला था। मगर ये कैसे हो सकता है जब मैं उस दिन कोलकाता पुलिस की कैद में था।
एसटीएफ की हिरासत में हम पांच लोग थे। हमें जिस तरह से प्रताड़ित किया गया मैं सोच भी नहीं सकता। उन्होंने हमें बिजली के झटके दिए, हमें उल्टा लटकाया और नाक में पानी डाला, हमें टांगे खोलने को कहा और मारा, हमारे नंगे शरीर पर पेट्रोल डाला, पेशाब पिलाया। हमें लगातार छह दिन सोने नहीं दिया।
हमारे बीच एक बांग्लादेशी भी था। उसने कहा कि वो हिन्दू है। उन्होंने उसके कपडे़ उतारे और देखा कि उसका खतना हुआ है या नहीं। उसका खतना नहीं हुआ था। एसटीएफ ने उसे वापस भेज दिया। इससे क्या नतीजा निकलता है – कि अगर आप मुसलमान हो तो आप स्वाभाविक रूप से संदेह के दायरे में आ जाओगे।

मुख्तार हुसैन
उम्रः 39 साल
पूर्वी मिदनापुर, पश्चिम बंगाल
मैं मिदनापुर में दर्जी था। मेरे तीन बच्चे हैं। मेरे आस पास सबके पास मोबाइल फोन थे। मैंने सोचा मुझे भी मोबइल ले लेना चाहिए। मुझे क्या पता था ये सीधा-साधा काम ही मेरी जि़ंदगी बर्बाद कर देगा।
मैंने एक पुराना फोन खरीदा। मेरी बहन की शादी के दौरान कॉल आई कि मैंने 5000 रूपए की लॉटरी जीत ली है और कोलकाता से रकम लेने के लिए कहा। मुझे शादी की तैयारी करनी थी इसलिए नहीं गया। 23 जून 2007 को जब मैं नंदकुमार बाज़ार में साइकिल खरीद रहा था तो फिर से कॉल आई। इस बार कहा कि वे मुझे पैसे देने बाज़ार आएंगे। इससे पहले कि मैं कुछ जान पाता यूपी एसटीएफ के लोगो ने मेरा मुंह ढक दिया और मुझे कोलकाता में भवानी भवन ले गए। फिर उन्होंने मुझे और अली अकबर को लखनऊ में आतंकवादी हमला रचने के इलज़ाम में गिरफ्तार किया।
मगर उस दिन से पहले कभी मैं अली अकबर को नहीं मिला था और न ही कभी लखनऊ गया था। 30 जून को मुझे लखनऊ कोर्ट के सामने पेश किया और हूजी के जलालुद्दीन द्वारा बनाई गई आतंकवादी साजिश का हिस्सा होने का इलज़ाम लगाया गया। पुलिस के अनुसार हमने जलालुद्दीन के गिरफ्तार होने की खबर टीवी पर देखी, अपने विस्फोटक छिपा दिए और कोलकाता भाग गए।
ये कहानी पुलिस द्वारा बनाई गई थी। हुआ ये था कि पुलिस हमें एक खाली पड़े ईंट भट्टे में ले गई थी और कहा कि मीडिया यहां आएगा। जब हम इंतज़ार कर रहे थे तो एक पुलिस अधिकारी सीमेंट, फावड़ा और बैग लेकर भट्टे में गया। उसने एक गड्ढा खोदा, उसमें बैग रखा और उसे ढक दिया। कुछ मिनटों में मीडिया और अन्य अधिकारी आए। पुलिस ने उन्हें वो गड्ढा दिखाया, बैग खोला और मीडिया को बताया कि हमने दो किलो आरडीएक्स, 10 डेटोनेटर और 10 हथगोले वहां छिपाए हुए थे।