अखिलेश यादव का राजनीतिक सफर

साभार: अखिलेश यादव, फेसबुक पेज

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) का पारिवारिक दंगल जारी है। राज्य और देश भर की जनता इस दंगल के नतीजे का इंतज़ार कर रही है। आखिर इसके खिलाड़ी हैं राज्य के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव और सपा पार्टी के संस्थापक और अब तक रहे मुखिया, मुलायम सिंह यादव। ये लड़ाई सिर्फ बाप -बेटे की नहीं है, इसका असर देश के सबसे बड़े राज्य यू पी और देश भर पर पड़ेगा। यू पी में होने वाले चुनाव जल्द ही दंगल का नतीजा बताएँगे, लेकिन इस कलह की वजह से अखिलेश के प्रति लोगों का समर्थन और बढता हुआ नज़र आ रहा है।
1 जुलाई, 1973 में उत्तर प्रदेश में इटावा ज़िले के सैफई गांव में जन्मे अखिलेश यादव देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं। 38 साल की उम्र में वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। भारतीय राजनीति में अखिलेश युवा राजनेता के रूप में चर्चित रहे हैं। 2000 में पहली बार अखिलेश यादव 27 साल की उम्र में कन्नौज से लोकसभा सांसद चुने गए। इसके बाद वह लगातार दो बार सासंद चुने गए। 10 मार्च, 2012 में अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी विधायक दल का नेता चुना गया। 15 मार्च, 2012 में वह देश में सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने।
मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने यू पी की राजनीति का चेहरा बदला है। युवा लोगों का सहयोग और तकनीकी विकास पर अखिलेश ने काफी जोर दिया है। राज्य के लोगों का मानना है कि यू पी में बेहतरीन हाईवे, मेट्रो, लैपटॉप वितरण और कई ऐसी योजनाएं लागू हुई हैं जिनकी वजह से राज्य को विकास की एक नयी दिशा मिली है। ये भी माना जाता है कि जिस राज्य में धर्म और जाति के आधार पर लोगों और वोटों को बांटा गया है, उसी राज्य में अखिलेश ने जाति- धर्म की राजनीति नहीं की है, बल्कि आधुनिकीकरण और तरक्की की बातें की हैं। सपा में शासन का एक रूप पार्टी से जुड़े बाहुबली रहे हैं। ऐसे कई बागी और अपराधी हैं जिनका पार्टी से जुड़ाव रहा है। चित्रकूट में डकैत ददुआ के परिवार के सदस्य सपा के विधायक और सांसद रहे हैं और चम्बल की मशहूर डकैत फूलन देवी भी सपा की सांसद थी। मुलायम सिंह ने इन लोगों को राजनीतिक शरण दी है, लेकिन अखिलेश ने शासन में ऐसे लोगों को ख़ास तवज्जो नहीं दी है। तो एक तरह से यादव परिवार और सपा में चल रही यह जंग शासन के पुराने तरीके को बदलने की जंग भी रही है।
जहां तक तकनीकी विकास और आधुनिकीकरण की बात है तो इसका दूसरा पहलू ये है कि हाईवे बने हैं बड़े शहरों के बीच, ग्रामीण इलाकों में सडकें खस्ता हालत में हैं और कई योजनाओं के ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वयन में कमियाँ हैं। 1090 की सेवा जिसका काफी प्रचार हुआ है, उसकी पहुँच भी ग्रामीण इलाकों में बहुत कम महिलाओं तक है। लैपटॉप वितरण तो हो गया लेकिन राज्य में कई गाँव हैं जहां बिजली नहीं है, ऐसे में लोग अपने लैपटॉप इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं या उन्हें बेचने पर मजबूर हैं। इसके बावजूद अखिलेश के समर्थकों का ये कहना है कि योजनाओं पर काम तो हुआ, उन्हें लागू होने में समय लग जाएगा।
अखिलेश को यू पी के विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से भी टक्कर लेनी है। भाजपा का हर ज़िले में जोर- शोर से प्रचार प्रसार चलता रहा है। लेकिन ये माना जा रहा है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और इसलिए लोगों को स्पष्ट नहीं है कि वे किसके लिए वोट करें। एक तरफ जहां अखिलेश के चेहरे और काम से राज्य के लोग परिचित हैं, वहीँ भाजपा के चुनावी मोहरे से लोग बिलकुल अपरिचित हैं। यू पी में नोटबंदी का भी ग्रामीण इलाकों में लोगों पर गहरा असर पड़ा है। किसान, मजदूर, दुकानदार, ठेकेदार – सबके धंधे मंदे पड़ गए थे। इस वजह से भी ये समझा जा रहा है कि राज्य की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भाजपा को अपना समर्थन नहीं देगा। क्या इनके वोट अखिलेश को मिलेंगे या किसी अन्य पार्टी को? बसपा में अब तक रणनीति को लेकर स्पष्टता नहीं है, न ही कोई ख़ास प्रचार -प्रसार हो रहा है। ऐसे में क्या ये वोट भी अखिलेश को मिलेगा?
यू पी में वोटिंग के पहले चरण में अब बस एक महीने का समय रह गया है। पिछले एक महीने की घत्नूं से ये स्पष्ट है कि भले ही साइकिल चिन्ह अखिलेश को मिले या न मिले, लोगों का समर्थन उन्हें ज़रूर मिल रहा है। अब देखना ये है कि क्या ये समर्थन वोट का रूप ले पायेगा या नहीं।